Friday, April 25, 2008

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Thursday, January 24, 2008

ब्लोगिंग के लिए एक उपयोगी सॉफ्टवेयर


डिजिट नामक कंप्यूटर की पत्रिका के साथ एक सीडी और एक डीवीडी आती है जिसमें कई उपयोगी सॉफ्टवेयर आते है.सितंबर 2007 की डिजिट की सीडी मे एक ब्लोगिंग सॉफ्टवेयरpost2blog दिया हुआ है जो कि बहुत ही उपयोगी है.एक तो विंडोज लाईव राईटर की तरह विंडोज की साइट पर रजिस्टर करना जरूरी नहीं है.आप इसको अपने कंप्यूटर मैं डालकर सीधा ही काम मैं ले सकते है.इसका टैक्स्ट एडीटर बहुत ही समृद्ध है जिसमे सबस्क्रिप्ट,सुपरस्क्रिप्ट,आदि उपयोग मै लिया जा सकता है ,इसमैं साथ मैं ही पिक्चर एडीटर भी है ,जिसमे आप फोटोग्राफ डालने से लेकर उसकी साईज ,कैप्शन डालना सब यहीं कर सकते है.यह डाउनलौड डॉट कॉम पर डाउनलौड के लिए भी उपलब्ध है.

Sunday, January 20, 2008

समझो भाई ब्लोगिंग तुम्हारे लिए नहीं....

कुछ लोग यहां बङे लेखक हैं,कुछ बङे तकनीकि विशेषज्ञ हैं.....सैल्फ मैड.शायद ब्लोगिंग को इन्होने बपौती समझ लिया है,उन्हें समझ लेना चाहिये.कि भाई लोग आप लोगों से ही परेशान होकर कुछ नया करने की चाह मैं लोगों ने ब्लोगिंग जैसे माध्यम को चुना है.और कचरा क्या है ये बंधुओ आप लोगों को अधिकार किसने दिया,संभवतया भारत के संविधान मैं तो नहीं.तो ये सब बहस किस लिये.आप को जो पढना है ,पढें न पढना है न पढें पर कम से कम  इतनी बात तो समझ लें कि यह माध्यम बेलाग,बेबाक  अभिव्यक्ति का माध्यम है और कम से कम इसमे तो कोई झूमरी तलैया या कचरा करने की कोशिश न करें.

रोज पढते हैं ..हम आप को,

सुनते हैं आप लोगों की बकवास...

टी वी के चैनलों पर

  ,आप की अभिव्यक्तियों को

जिन्हें बङी ही अटपटी

अंजान सी

पर प्रभावी सी दिखने वाली भाषा मैं लिपटी झूठ,

अब समझ आने लगी है,

अपने खुद के बनाये बुध्दिजीवी के झूठे प्रभामंडल को देख देख

उकता चुके लोगों को अपने कृत्रिम विश्लेषणों से

मुक्त होने दें अब,

हो सकता हैं आप पत्रकार हैं,या के लेखक या तकनीक विशेषज्ञ,तो क्यों नहीं आप लोग ही अपनी कोई इज्जतदार ,स्वायंभू,sobber,जगह तलाशें,क्यों कि यहां सब पके हुए लोग हैं ..........एन डी टी वीयों,आज तकों,और  सही मायने मै इन अभिव्यक्ति के ठेकेदारों से.सो बंधुओ आप लोग कोई दूसरी जगह तलाश लें और इन छोटे मोटे लोगों को बोलने दें,क्यों कि ये अब रुकने वाले नहीं है.और क्यों अपना भी कचरा कर रहें हैं.

Saturday, January 19, 2008

अरे भाई समझो ब्लोगिंग तुम्हारे लिए नहीं है

 

काहे परेशान होते हैं आप यहां देखें झूमरी तलैया है..या कबाङ खाना है ,ये है ही ऐसा माध्यम की जिसमें लिखने वाला कोई भी मेरे जैसा व्यक्ति जिसे कि अपने कोई बहुत बङा लेखक होने का मुगालता नहीं है,जो अपनी बात बिना किसी लाग लपेट के कहना चाहता है.और सच पूछो तो बहुत कुछ पत्रकार और पत्रकारिता नुमा चीज से परेशान उन लोगों की जुबान है जिन्हें कहना तो बहुत कुछ है पर इस मीडिया माफिया की टी आर पी रैटिंग बढाने वाली खबरों के बीच उसे कहीं कोई जगह नहीं मिल पाती,तो भैये

मुझे नहीं लगता कि कोई भी चिट्ठाकार अपने आप को बहुत बङा लेखक या विचारक साबित करने के लिए ये सब करता है.और जो करता भी है तो बहुत जल्दी समझ भी जाता है कि यह सब नहीं चलने वाला है.आप अच्छा सार्थक लिखते हैं तो ही तो कोई इसे पढने वाला है ,अन्यथा एक डिब्वा बंद फिल्म की तरह उसे कोई नहीं छेङने वाला है,इसलिए गाहे बगाहे जैसे कुछ लेखकनुमा या पत्रकार नुमा महानुभाव इम बात से परेशान हैं कि मुझ जैसे लोग जो कि चिकित्सक ,व्यापारी,प्रबंधक ,छात्र ,गृहिणियां,जैसे सामान्य लोग क्यों कर इन भाई लोगों की ठेकेदारी मैं भांजी मार रहैं हैं ,तो बंधु आप जैसे सुस्थापित लेखकों के लिए ब्लॉगिंग नहीं हैं ,आप के लिये हैं न इंडियन एक्सप्रैस,टाइम्स ऑफ इंडिया,हिंदुस्तान .......

Friday, January 11, 2008

गरीबी बढाने वाली कार ....

Tata_1_lakh_carलखटकिया कार के चर्चे जोरों पर है.अब टाटा मोटर्स का सपना कि हर घर मैं एक कार जरूर होगी,भले ही हमारे पास उसे खङा करने की जगह न हो ,या के अपनी जरूरतों को खींच तान कर पूरा करने का पैसा हो न हो कार जरूर होगी.देखना ये है कि इस कार को खरीदने वाला कौन होगा .शायद वह व्यक्ति जो जुगाङ करके लोन पर जैसे तैसे करके मोटर साइकिल या स्कूटर खरीदता है,और महिने के आखरी हफ्ते मैं उसे थोङा कम चलाता है,कि अगले महिने की तनख्वाह मिलने तक किसी से उधार न लेना पङे.या वह व्यक्ति जिसके पास एक कार तो है पर अपनी पत्नी के लिए या के .कॉलेज मै जाने वाले अपने अभी अभी जवान बच्चे के लिए ही इसे खरीदेगा बड्डे गिफ्ट.दोनों ही स्थिति मैं यह कार मात्र बोझ बढाने वाली सावित होने वाली है,क्यों कि एक के लिए इसको खरीदने का पूरा पैसा नहीं है और दूसरे को आवश्कता नही पर वह खरीदेगा जरूर.

क्या जरूरी थी इस कार का बनाना.हमारी सङकों पर दुपहिया वाहनों के लिए भी बमुश्किल जगह मिल पाती है.उस पर बढता प्रदूषण जिसे और बढाने इस कार का योगदान निस्संदेह बहुत बङा होगा.हमारा देश अपनी पैट्रोल की जरूरते पूरा करने मै अक्षम है ,रोज बङे बङे अक्षरों में खबरें छपती हैं पैट्रोल कंपनियों का घाटा इतने हजार करोङ.हमारे पास हाल की  आवश्यकताएं पूरा करने का साधन नहीं ,और  हम इसे और बढाते जा रहें हैं,जिसकी परिणति अंततः देश का स्वाभिमान गिरवी रखकर ऐसे समझोते करने मैं होती है ,जिसका भान यदि हर देश वासी को कराया जाये तो वह कार की बजाय साईकिल पर चलना पसंद करेगा.

आप को कार खरीदनी है ,आप खरीदिये.पर जरा सोचिये की ये चीजें क्या हमें अपनी बनाई हुई आवश्यकताओं के गर्त मै  नहीं धकेल रही हैं.हमारे घर से लेकर  देश का पूरा बजट हमारी इसी सोच के चलते घाटे का शिकार होता जा रहां है,और दूसरे हम प्रकृति का दोहन कितना करेंगे.कहीं तो हमें देश की जनता को समझाना पङेगा कि कार मै चलने से ज्यादा जरूरी है साफ हवा मै  सांस लेना जो कि हम इतनी दूषित कर देंगे की किसी समय हमें साफ हवा के लिए घर से बाहर निकलने से पहले ऑक्सीजन सिलैंडर लेकर बाहर निकलना पङेगा.

Tuesday, January 8, 2008

क्या गरीब इंजिनियर नहीं हो सकता......

मेरे पङौस मे रहने वाला गबरू डायबिटीज का रोगी है और छोटा मोटा मजदूरी का काम कर पेट पालता है. गबरू का बी पी एल कार्ड मैं अपनी तमाम जानकारियों के बाद भी नहीं बनवा पाया .क्यों कि उसने हमारे वर्तमान वार्ड मैंबर के विरोध में मतदान किया था.तो मुझे याद आई 4-5 साल पहले की एक घटना जब मै जोधपुर आयुर्विज्ञान महाविध्यालय से चर्म रोग  रोग विभाग  में एम डी करते समय , एक दिन एक अच्छा सूटेड बूटेड मरीज पिंपल्स दिखाने के लिए आया.चूंकि हम वरिष्ठ रेजिडेंट चिकित्सक थे,इसलिए रोगी को देखने के बाद उपचार लिखने का अधिकार भी हमें ही था.मैनें जैसे ही दवाई लिखने के लिए पैन चलाना प्रारंभ किया उसने अपना बी पी एल कार्ड आगे किया .चूंकि बी पी एल मरीजों को सरकार की नीति के अनुसार समस्त औषधियां मुफ्त में मिलती थी,इसलिए मैं चौंका ,क्यों कि चिकित्सालय अधीक्षक का मौखिक आदेश था कि ऐसे रोगियों को आवश्यक दवाईयां ही लिखी जायें,और पिंपल्स में ऐसी कोई समस्या नहीं कि जान पे बन आ रही हो .तो मैने उससे पूछा कि भाई आप क्या करते हैं तो उसने बोला कि मैं सिविल इंजिनियर हूं,तो मैने कहा कि इंजिनियर गरीब कैसे हो सकता है.....उसने आंखे तरेर कर मेरी तरफ देखा ,और बोला ...क्यों गरीब को इंजीनियर बनने का भी हक नहीं है क्या........सचमुच लोकतंत्र मैं कोई भी गरीब हो सकता है...बस एक सर्टिफिकैट चाहिये......... क्या गरीब इंजिनियर नहीं हो सकता......

मेरा पेट दुख रहा है मैं क्या करूं....

मुझे कोई बताये ,मेरे पेट में मरोङ उठ रहै हैं,मेरे लैपटॉप से में ब्लॉगवाणी ,चिट्टा जगत ,नारद तो खोल पा रहा हुं,चिट्ठे पढ भी पा रहा हूं पर न तो अपना ब्लॉगर का अकाउंट खोल पा  रहा हूं,और ना ही किसी ब्लोग पर टिप्पणी कर पा रहा हूं.पैज कैन नॉट बी डिस्पलैड लिखा आ जाता है .अब आप ही बताइये मैं क्या करूं.लोग क्या -क्या लिखे जा रहै हैं,और मैं   मुंह तो खोलता हूं पर आवाज नहीं निकलती वही पैज .....मुझे लगता है कि मेरी अमूल्य  टिप्पणियों के बिना चिट्ठाकार अपने को थोङा अकेला महसूस कर रहें होंगे.कोई है जो मुझे बता सके ऐसा क्यों हो रहा है.और मुझे क्या करना चाहिये.अगर दो एक दिन और ऐसा चला और मैं टिप्पणियां नहीं कर पाया तो मुझे लगता है कि मेरा सर्वर पक्का ही डाउन हो जाना है .तो बंधुओ यदि आप मुझे नर्वम ब्रैकडाउन से बचानै का उपाय कीजिये क्यों कि ...औ...हौ... हाय हाय ...मेरा पेट